Tuesday, January 17, 2017

अपना जीवन

"अपना जीवन "
परम श्रद्धेय गुरूदेव १००८ श्रीमत् परमहंस परिव्राजकाचार्य श्रोत्रिय ब्रह्मनिष्ठ विद्वद वरिष्ठ दण्डी स्वामी महादेव आश्रमजी महाराज (वीतराग ब्रह्मचारी श्री महेश चैतन्य जी महाराज ) द्वारा रचित पुस्तिका "नैतिक शिक्षा" में से साभार

बड़ों का आदर करना, साफ़ शुद्ध रहना, अपने निकट की सभी वस्तुओं का उचित संरक्षण करना, बिना पूछे किसी की वस्तु न लेना, बड़े बूढ़ों एवं रोगी तथा बालकों की सहायता करना, ईमानदार रहना, अतिथि सत्कार करना, गुरूजनों का आदर करना, सत्शास्त्रों का चिंतन करना आदि नैतिक ज्ञान है। उपरोक्त के अतिरिक्त और भी बहुत सारी बातें नैतिकता में आती हैं। जैसे सत्य अहिंसा अपरिग्रह आदि। भगवान वेदव्यास ने बड़ा सरल उपाय बताते हुए कहा है---
"आत्मनः प्रतिकूलानि परेषां  न समाचरेत्"
अर्थात् जो कार्य आपको अपने साथ दूसरों के द्वारा किये जाने पर अच्छा न प्रतीत होता हो, वह कार्य आप कदापि दूसरों के साथ न करें।
अतः प्रत्येक व्यक्ति का कर्तव्य है कि वह अपने परिवार में स्वयं स्वच्छ्ता, ईमानदारी, कर्तव्य-परायणता, परिश्रम से युक्त होकर अपने परिवार के अन्य सदस्यों को इनके लाभ से अवगत कराना चाहिए। हमें परिवार के सभी सदस्यों को यह शिक्षा देनी चाहिए कि हमें अपने दैनिक कार्यों के निर्वाह मात्र में ही सारा समय नष्ट नहीं कर देना चाहिए। हमें प्रत्येक दिन कुछ न कुछ कार्य दूसरों के लिए अवश्य करना चाहिए। जिस मार्ग पर हम चलते हैं उसकी सफाई करना, उसको गन्दा न करना तो हमारा अपना ही कार्य है क्योंकि हम उस मार्ग पर चलते जो हैं यह परोपकार कहाँ हुआ अतः हमें अपने परिवार को इन सब बातों से अवगत कराकर अपना कार्य तो अवश्य ही करना चाहिए तथा सदैव सभी को दूसरों का कार्य भी करने की प्रेरणा देनी चाहिए। यहाँ यह जान लेना अत्यंत आवश्यक है कि अपने कार्यों को करने के पश्चात् ही दूसरों के लिए कार्य करना उचित है तथा एकमात्र अपने ही कार्यों में सारा समय नष्ट कर देना दूसरों के लिए कुछ भी समय न निकालना आत्मघात जैसा कार्य है। हमें अपने परिवार में व्यर्थ बैठकर गप लड़ाने वाले आगन्तुकों को रोकना ही होगा तथा स्वयं भी परिवार के सदस्यों को केवल व्यर्थ की बातें करने में ही समय नष्ट करने से रोकना होगा। परिवार के सभी सदस्यों को प्रातःकाल जल्दी उठकर अपना कार्य स्वयं करना चाहिए तथा यदि हो सके तो परिवार के दूसरे सदस्यों के कार्यों में भी उनकी प्रसन्नता के लिये सहायता करनी चाहिये। आलस्य में पड़े रहकर दूसरों का मुँह ताकना बुरी बात है। परिवार में भगवान के प्रति आभार प्रकट करने की (प्रार्थना करने की) आदत सभी को डालनी चाहिये जिससे सभी लोग अनुशासित रहकर परिवार एवं राष्ट्र के उत्थान के लिये सुदृढ़ हो सके। यदि परिवार का कोई व्यक्ति अपने बुरे स्वभाव के कारण दूसरों का अपमान भी करता हो, उसे भी सहन करना चाहिये। स्वयं विनम्र होकर उसे ऐसा करने से रोकना चाहिए। सदा भयभीत करके ही दूसरों को नहीं सुधारा जा सकता। संक्षेप में यही कहना चाहिए कि परिवार के सभी सदस्यों को स्वयं आलस्य, क्रोध आदि को त्यागकर दूसरे पारिवारिक सदस्यों की सुख सुविधा का ध्यान रखना चाहिए, सभी को अपना अपना कार्य स्वयं करना चाहिए तथा अन्य सदस्यों को भी ऐसी ही शिक्षा देनी चाहिए।
माँ संसार का प्रथम गुरू है बालक माँ के समीप रहकर बचपन में ही पुस्तकों से कहीं ज्यादा सीख सकता है। अतः नारी को सर्वप्रथम सुसंस्कृत होकर परिवार के लिये अच्छे संस्कार देना अनिवार्य हो जाता है।

Thursday, December 15, 2016

"लालच"

"लालच "
परम श्रद्धेय गुरूदेव द्वारा रचित पुस्तिका "नैतिक शिक्षा" में से साभार

नाम सुमिर पछतायेगा।
पापी जियरा लोभ करत है आज काल उठ जायेगा।
लालच लागी जन्म गंवाया माया भ्रम भुलायेगा।
धन जीवन का गरब न कीजे कागज ज्यों गल जायेगा।
अर्थात् मनुष्य के अंदर काम, क्रोध व लोभ आदि की वृत्ति प्राकृतिक देन है। इनसे युक्त मनुष्य सहज ही पापाचरण कर बैठता है। अतः हमें लालच आदि से बचने का प्रयत्न करना चाहिये। लालच के कारण मनुष्य की क्या दुर्गति होती है यह इस कहानी से स्पष्ट हो जाता है--
हीरामन नाम का एक ब्राह्मण बद्रीकाश्रम के पुण्य क्षेत्र में नैनसी नामक गाँव में अपने परिवार के साथ रहता था। हीरामन बड़ा भक्त था। वह गाँव के शिवालय में प्रतिदिन बड़ी निष्ठा एवं विधि से शिवपूजन किया करते थे। वहीं शिवालय के समीप एक बिल में एक महासर्प रहता था। पंडित हीरामन प्रत्येक दिन सर्प को दूध पिलाया करता थे। दूध पीकर वह सर्प एक बार बिल में जाता था और बाहर निकलकर उनको उसी समय एक स्वर्ण मुद्रा लाकर देता था। यही क्रम बरसों तक चलता रहा। एक दिन हीरामन को किसी कार्यवश पाँच दिनों के लिये बाहर जाना पड़ा। उसने सर्प देवता के सामने जाकर कहा कि मेरा बेटा मंगल मेरी ही भाँति नित्यप्रति आपकी सेवा को आया करेगा। सर्प देवता ने यह बात स्वीकार कर ली। पंडित हीरामन के बाहर चले जाने पर मंगल दूध लेकर सर्प के बिल के समीप रख आया, रोज़ की भाँति दूध पीते ही सर्प ने एक सोने की अशर्फी बिल के बाहर लाकर रख दी। यह देखकर मंगल बड़ा खुश हुआ। वह रोज़ की ही भाँति प्रत्येक दिन अशर्फी लाता था, एक दिन उसके मन में अशर्फियों के प्रति बड़ा लालच आ गया, वह सोचने लगा सर्प देवता के बिल में कोई बड़ा खजाना है, दूध के लालच के कारण सर्प देवता मुझे एक-एक अशर्फी ही प्रतिदिन देते हैं। क्यों न मैं इस महान सर्प को मारकर सारा खजाना एक ही दिन में ले लूँ ? यह सोचकर अगले दिन वह अपने साथ एक बड़ी लाठी लेकर शिवालय गया। सर्प देवता के दूध पीते समय लालची मंगल ने ज्यों ही लाठी का प्रहार सर्प पर करना चाहा उसी समय पहले से सावधान सर्प ने खड़े होकर तेज फुंकार छोड़ी तथा मंगल को डराकर तेजी से बिल में घुस गया। भयभीत मंगल बेहोश हो गया। होश में आने पर उसने देखा कि मेरी आँखों की ज्योति चली गयी है। यात्रा से लौटने पर हीरामन ब्राह्मण ने सर्प देवता के पास जाकर जोर-जोर से उन्हें पुकारा, परन्तु आज कोई उत्तर नहीं था। बहुत अधिक प्रयास करने पर निराश ब्राह्मण घर वापस आ गया। लालच के कारण उसके पुत्र ने सारा धन गंवा दिया।
लालच बुरी बला है।

Thursday, May 29, 2014



"Kisiko kasht dena kewal apne paapon ko badhana hai."




Wednesday, May 28, 2014

  
"Ye tan vish ki belari, Guru amrit ki khan,
Shish diye jo Guru mile, to bhi sasta jaan."




Monday, May 26, 2014

Imaandaari



"Imaandaari se badi pavitra karne wali dusri koi vidha nahi hai"







Friday, May 23, 2014


"Apne Prabhu par hamesha bharosa rakho, vo aapki har baat ko dekhte hai, jarurat padne par chupke se sahyaata bhi karte hain."
                               Baba Mahadev

Thursday, May 22, 2014

Satya Vyavhaar


Satya ka Vyavhaar Parmatma ki sukhad anubhuti karata hai..........