Sunday, February 5, 2017

"सत्यम् शिवम् सुन्दरम्"



परम श्रद्धेय गुरूदेव द्वारा रचित पुस्तिका "नैतिक शिक्षा" में से साभार

एथेनियन कवि एगोथेन को ग्रीक थियेटर में प्रथम पुरस्कार प्राप्त हुआ था उसी के उपलक्ष्य में उसने अपने परम विद्वान् दार्शनिक  मित्रों को एक विशाल भोज दिया था। समागत मित्रों ने मनोरंजन के लिये वार्तालाप का विषय "प्रेम" रखा, और उस पर सबने अपना-अपना मतव्य रखना प्रारम्भ किया। 
अपनी बात रखते हुए फेडरस ने कहा--"प्रेम परम देवता तथा सबका अग्रणी है। यह उनमें सर्वाधिक शक्तिशाली है।यह वह वस्तु है, जो एक साधारण मनुष्य को वीर के रूप में परिणत कर देती है क्योंकि प्रेमी अपने प्रेमास्पद के सामने अपने को कायर के रूप में प्रदर्शित करने में लज्जा का अनुभव करता है।वह तो अपना शौर्य प्रदर्शित कर अपने को शूरतम ही सिद्ध करना चाहता है।यदि मुझे एक ऐसी सेना दी जाए,जिसमें केवल प्रेमी ही प्रेमी हो तो मैं निश्चय ही विश्व विजय कर लूँ। "
पायनियस बोला --"आपकी बात बिलकुल ठीक है फिर भी आपको जीवों से प्रेम तथा दिव्य ईश्वरीय प्रेम को अलग-अलग स्वीकार करना ही होगा। सामान्य प्रेम--चमड़ियों के सौन्दर्य पर लुब्ध मन की यह दशा होती है कि यौवन का अंत होते-होते उसके पंख जम जाते हैं और वह उड़ जाता है, छूमंतर हो जाता है पर भगवत्-प्रीति अर्थात् परमात्म-प्रेम सनातन होता है उसकी गति सदा विकास की ओर ही होती है। "
हास्य कवि अरिस्टोफेंस ने कहा --"प्राचीन युग में नर-मादा का एक होना ही विग्रह में समन्वय था। उसका स्वरूप गेंद जैसा गोल था, जिसके चार हाथ, चार पैर तथा दो मुँह होते थे। इसकी शक्ति तथा गति बड़ी तीव्र तथा तथा भयंकर थी। साथ ही इसका उत्साह अपार था। ये देवताओं पर विजय पाने के लिए आतुर हो रहे थे। उसी समय ग्रीक देश के सर्वश्रेष्ठ देवता जियस ने इनके दो विभाग इसलिए कर दिये जिससे इनकी शक्ति आधी रह जाए। उसी समय से स्त्री-पुरुष का विभाजन हुआ। ये दोनों शक्तियाँ आज भी पुनर्मिलन के लिए आतुर दिखती हैं। इस आतुरता को ही हम प्रेम शब्द से पुकारते हैं। " अरिस्टोफेंस की वार्ता पर सभी अतिथि जी भर कर हंसे।
इसके पश्चात् उस समय महान सन्त एवं दार्शनिक सुकरात ने अपने सिद्धान्त को प्रकाशित करते हुए कहा --
"प्रेम ईश्वरीय सौन्दर्य की भूख है। प्रेमी भक्त ईश्वर प्रेम के द्वारा अमृतत्व की ओर अग्रसर होता है। विद्या, पुण्य, यश, उत्साह, शौर्य, न्याय, विश्वास और श्रद्धा ये सभी उस सौन्दर्य के ही भिन्न-भिन्न रूप हैं। यदि एक शब्द में कहा जाये तो आत्मिक सौन्दर्य ही परम सत्य है और सत्य वह मार्ग है जो सीधे परमेश्वर तक पहुँचा देता है। "

Saturday, February 4, 2017

"संतुलित आहार "



परम श्रद्धेय गुरूदेव द्वारा रचित पुस्तिका "नैतिक शिक्षा" में से साभार

                                आह्रियते असौ आहारः
अर्थात् शरीर की जीवनी शक्ति को विकसित करने के लिये मनुष्य जिन पदार्थों का भक्षण करता है आहार कहलाता है। आहार का मनुष्य के लिए पौष्टिक होना अत्यंत आवश्यक है। सामान्य रूप से स्थिर रहने वाले, तीक्ष्णता से रहित, रसयुक्त, ताज़े, हृदय को रुचिकर खाद्य पदार्थों को संतुलित आहार कहा जाता है। परन्तु इसमें भी क्रम सापेक्ष माना गया है अर्थात् आयुर्वेद के अनुसार मनुष्य को रात्रि के अंतिम पहर (प्रातः काल उठते ही) में शौचादि से पूर्व जल पीना चाहिए। इसके पश्चात् अन्य आवश्यक कार्यों को को करता हुआ मध्यान्ह में ऊपर कहे गये रसादि से युक्त भोजन को करना चाहिये। भोजन के अंत में नमक से युक्त मट्ठा पीना चाहिये। इसके विपरीत तेज लवण आदि से युक्त, सूखे, बासी, अस्वच्छ एवं अपवित्र, किसी के खाने के बाद छोड़ा हुआ, असमय (समय निकलने के बाद), कम अंतराल के बाद, बार-बार खाने से शरीर में रोग बढ़ता है। 
संक्षेपतः मनुष्य को कम से कम चार घन्टे के पश्चात् ही संतुलित भोजन करना चाहिए। एक समय से दूसरे समय के भोजन के बीच में चार से छः घन्टे का समय उपयुक्त माना गया है। रात्रि के भोजन के पश्चात् सोने से पहले दूध पीना अत्यंत हितकारी है।

Friday, February 3, 2017

" हमारा स्वास्थ्य एवं स्वास्थ्य वृद्धि के नियम"




परम श्रद्धेय गुरूदेव द्वारा रचित पुस्तिका "नैतिक शिक्षा" में से साभार

"समदोषः समाग्निश्च  समधार्तुमलक्रियः।
प्रसन्नात्मेन्द्रियमनाः स्वस्थ इत्यभिधीयते।।"
अर्थात् वात, पित्त, कफ (त्रिदोष) की समानता तेरह अग्नियों की समानता, सप्तधातुओं की समानता और मलमूत्र पसीना आदि मलद्रव्यों की समानता तथा मन इन्द्रिय एवं आत्मा की प्रसन्नता स्वास्थ्य कहलाता है।
अतः स्पष्ट हो जाता है कि यदि उपरोक्त सभी बातें ठीक हो तो मनुष्य पूर्ण स्वस्थ कहलायेगा। आयुर्वेद में मनुष्य को स्वस्थ रहने के लिये पग-पग पर दिनचर्या एवं ऋतुचर्या के अंतर्गत आरोग्यदायक शिक्षाओं का भी समावेश किया गया है। जैसे ---
(१) शौच के पश्चात् स्वच्छ मिट्टी से हाथ धोने चाहिये। आधुनिक युग में विज्ञानं ने भी इस बात को स्वीकार किया है कि मनुष्य के मल में उपस्थित फेरस नामक यौगिक साबुन से स्वच्छ नहीं होता है क्योंकि रसायनिक अभिक्रिया के अनुसार फेरस के साथ साबुन का संयोग हो जाने पर मलपूर्ण अवक्षेप बन जाता है तथा मिट्टी में स्थित सिलिकन नामक तत्व फेरस के साथ मिलकर फेरोसिलिकनऑक्साइड़ के झाग उत्पन्न करता है। जिससे मल पूर्णता साफ हो जाता है।
(२) दाँतों की अशुद्धि से अधिकांश पेट की बीमारियां जन्म लेती हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन के प्रसिद्ध चिकित्सक ए० डेविड बैनर्जी ने यह प्रमाणित किया है कि नीम का दातुन कैंसर और मुंह की अन्य बीमारियों को रोकने में सक्षम है। अतः दांत तथा मुख की शुद्धि के लिये नीम तथा बबूल की दातुन श्रेष्ठ है।
(३) शरीर के अंदर बाह्य प्रकोप से होने वाली बीमारी को रोकने में शरीर के अंदर की रोग प्रतिरोधक क्षमता कार्य करती है। अतः इस क्षमता को बढ़ाने के लिये व्यायाम (प्राणायाम, भ्रमण योगासन आदि) अत्यन्त आवश्यक है।
(४) शरीर की त्वचा में पसीना, वाष्प आदि को निकलने के लिये असंख्य छिद्र होते हैं इन छिद्रों से हर समय पसीने के द्वारा सोडियम क्लोराइड, यूरिया, लेक्टिक एसिड आदि हानिकारक द्रव्य निकलते रहते हैं जिससे शरीर के अंदर की रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ती है। परन्तु स्नान न करने के कारण त्वचा के अधिकांश छिद्र बंद हो जाते हैं अतः स्वस्थ रहने के लिये नित्य स्नान की नितान्त आवश्यकता है।
(५) आहार ही प्राणों का आधार है। आयुर्वेद में आहार, निद्रा, ब्रह्मचर्य यह तीन जीवन के उपस्तम्भ माने गये हैं। अतः मनुष्य को स्वस्थ रहने के लिये भोजन संतुलित रूप में, समय पर तथा ऋतु के अनुसार ही करना चाहिये। भोजन करने से पूर्व पैर धोना उत्तम माना गया है, क्योंकि पैर धोने से रक्त वाहिनियां सिकुड़ जाती हैं जिससे हृदय से आने वाला रक्त पैरों की तरफ कम और पेट की तरफ अधिक प्रवाहित होता है। जिससे भोजन पूर्णतया पाचन अंगों तक पहुँचता है। भोजन करते समय बोलने से शरीर में वायुदोष उत्पन्न हो जाते हैं अतः मौन रहकर भोजन करना चाहिये। अधिक गर्म अधिक चिकना तथा तेज मिर्च आदि से युक्त भोजन भी बासी भोजन की ही भांति पेट में रोगों की वृद्धि करता है। अतः भोजन हल्का गर्म किंचित घी की मात्रा का और मन लगाकर करना चाहिये। भोजन करते समय पहले मीठा, बीच में खट्टा तथा भोजन के अंत में नमक युक्त भोजन अच्छा माना गया है।
(६) अधिक निद्रा, अल्प निद्रा तथा सूर्योदय और सूर्यास्त के समय की निद्रा से मनुष्य की आयु क्षीण होती है। चिंतामुक्त होकर स्वच्छ और साफ स्थान पर सोना चाहिये। मध्यरात्रि के पहले की निद्रा अधिक लाभप्रद मानी गयी है।
(७) आयुर्वेद के अनुसार अधिक विषयभोग से भ्रम, बलक्षीणता, सुस्ती, पैरों की कमजोरी, धातु क्षय, इन्द्रियों की कमजोरी तथा अकालमृत्यु होती है। ब्रह्मचर्य आरोग्य का मुख्य सूत्र है। ब्रह्मचर्य या अतिअल्प कामाचार से स्मृति, आरोग्य, आयुष्य, मेधा, पुष्टि, यश एवं चिर यौवन की प्राप्ति होती है। अतः मनुष्य को यत्नपूर्वक ब्रह्मचर्य की रक्षा करनी चाहिये।
(८) मनुष्य को अत्यंत साहस, लोभ, शोक, भय, क्रोध, मान, निर्लज्जता, ईर्ष्या, अतिराग, परधन तथा परस्त्री हरण की इच्छा, कठोर वचन, चुगलखोरी, असत्यभाषण, परपीड़न, हिंसा आदि वेगों को रोकना चाहिए। यह मानसिक रोगों से बचने का अच्छा एवं एकमात्र उपाय है। इसी प्रकार मलमूत्र, शुक्र, अपानवायु, वमन, छींक, जंभाई, डकार, भूख, प्यास, नींद, आँसु और थकावट के समय श्वास आदि को रोकने का प्रयत्न नहीं करना चाहिए यह भी स्वास्थ्य के लिए अत्यन्त उपयोगी है।
(९) आयुर्वेद की दृष्टि से धैर्य, बुद्धि एवं स्मरणशक्ति की हानि से भी रोग बढ़ते हैं अतः मनुष्य को बुद्धि, स्मृति और धैर्य की वृद्धि के लिये ज्ञानमार्ग का अनुसरण करना चाहिये।
(१०) स्वस्थ रहने के लिये यह भी आवश्यक है कि शरीर में रोग को उत्पन्न ही न होने दिया जाये। शरीर को रोग रहित करने के लिये आयुर्वेद में अन्य उपायों के साथ-साथ आचार एवं रसायन का भी भी विशेष स्थान है। आत्रेय(पुनर्वसु) के मत के अनुसार सत्यवादी, अक्रोधी, मदिरा व अतिवासना से रहित, अहिंसक, शांत, प्रियभाषी, जपशील, पवित्र, धीर, दानी, तपस्वी, देवता, गाय तथा गुरू और वृद्धों की सेवा में रत, दयालु, समय पर सोने वाले, दूध और घी आदि का सेवन करने वाला बुद्धिमान, निरभिमानी, उत्तम आचार व्यवहार वाला, विशाल हृदय, धार्मिक कार्यों में संलग्न, भगवान के प्रति श्रद्धा रखने वाला, जितेंद्रय तथा स्थान एवं ऋतु के अनुसार आचरण करने वाला पुरुष रसायन युक्त कहा जाता है। जो मनुष्य इस प्रकार अपना जीवन व्यतीत करता है वह दीर्घायु, स्मृति, बुद्धि, आरोग्य, यौवन, कांति, बल, सिद्धि की प्राप्ति करता है। अतः मनुष्य को स्वस्थ रहने के लिये अपने जीवन में उपरोक्त सभी का पालन करना चाहिये।

Thursday, February 2, 2017

"उपवन "



परम श्रद्धेय गुरूदेव द्वारा रचित पुस्तिका "नैतिक शिक्षा" में से साभार

प्राचीन काल में सम्याप्रास के निकट एक ब्राह्मण ऋषि रहा करते थे।  उनके आश्रम के पास रमणीक उपवन था। उस उपवन में नाना प्रकार के फल एवं पुष्पों से युक्त अनेक वृक्ष थे उसकी नैसर्गिक शोभा को देखकर समस्त ऋषि एवं तपस्वी की तो बात ही क्या विद्याधर एवं गन्धर्व भी वहाँ विहार के लिये आया करते थे।  देवव्रत नामक ब्राह्मण वहाँ अपने शिष्यों को शिक्षा दिया करते थे। उपवन को इंगित करते हुए सदैव शिष्यों को स्वच्छ्ता का निर्देश दिया करते थे। उनके शिष्यों में वीरूध नामक एक शिष्य बड़ा आलसी एवं अकर्मण्य था। बार-बार समझाने पर भी वह अपनी आदत को छोड़ नहीं पाता था। कभी-कभी अपनी आदत के कारण उसे भूखों तक मरना पड़ता था। वह भोजन के समय भी सोता ही रहता था। उसके इस आचरण को देखकर गुरूदेव को बड़ी चिंता हुई। उन्होंने एक दिन विवश होकर उसकी कुटिया का आकस्मिक निरीक्षण किया तथा मुख्य द्वार पर पहुँचते ही जान लिया कि अस्वच्छ्ता के कारण वीरूध की वृत्ति मलेच्छों जैसी हो गयी है। अतः उन्होंने दूसरे शिष्यों को बुलाकर उसकी कुटिया से अनावश्यक गंदगी को बाहर फिकवा डाला तथा नित्य प्रति उसे अपने साथ स्नानादि कराने लगे। क्रमशः शौच, दन्तधावन, व्यायाम, स्नान एवं प्रार्थना आदि से नियमित होने पर वह दूसरे शिष्यों की भाँति ही निपुण हो गया क्योंकि उसने अपने परम शत्रु रूप अस्वच्छ्ता का परित्याग कर दिया था।

Monday, January 30, 2017

"मनन करने योग्य"


परम श्रद्धेय गुरूदेव द्वारा  संचालित  धार्मिक  मासिक पत्रिका  "सिद्ध सुमन  प्रभा " में  से  साभार
मेरी छोटी बहन कविता लखनऊ में एक टेलीफोन कार्यालय में ऑफिसर है, दो वर्ष पूर्व उसके पति की मृत्युं हो गयी थी, उस समय उसका एक मात्र पुत्र संगीत मात्र ८ माह  का था, दुर्भाग्य से उसके सास-ससुर ने भी उसे अशुभ मानकर उससे किनारा कर लिया था। मैंने जैसे-तैसे करके परिजनों के सहयोग से उसे एक मकान खरीदवा कर अलग रख दिया, पिछले दिनों से वह अपनी सर्विस कर रही थी। परसों रात्रि में अकस्मात् ही उसके एक पड़ोसी का फोन हमारे घर आया उसने बताया कि संगीत काफी बीमार है, चिकित्सकों ने ८ घंटे का समय दिया है, उसे अस्पताल में भर्ती किया गया है, शायद आज रात्रि मुश्किल से पार कर पाये। मेरी शारीरिक हालत ऐसी नहीं थी कि मैं चल भी पाऊँ अतः मैंने अपनी पत्नि को तुरंत सीतापुर से बस द्वारा लखनऊ पहुंचकर कविता को ढांढस बंधाने को कहा तथा स्वयं असहाय सा शैय्या पर पड़े-पड़े विचार करने लगा, प्रभु से प्रार्थना की कि हे प्रभु कविता ने ऐसे क्या पाप किये हैं जो इसे तीव्रतम आघात बारम्बार सहने पड़ते है। प्रभु इसकी रक्षा करो, मुझे अपने एक मित्र का उदाहरण याद आया कि श्री बालाजी महाराज शीघ्र ही कृपा करके मनोरथ पूर्ति करते हैं, मैंने सारी रात लेटे-लेटे श्री बालाजी महाराज के चरणों में प्रार्थना की तथा प्रातः काल जब मेरा मोबाइल मेरे पास बजा तो भय के मारे मेरी उसे उठाने की इच्छा नहीं हो रही थी। मुझे भय लग रहा था कि भगिनी कविता का करुण क्रन्दन मैं कैसे सुन पाउंगा, फिर भी साहस करके फोन ऑन करके सुना कविता की ख़ुश आवाज़ सुनकर जान में जान आई मैंने पूछा गुड़िया, "संगीत कैसा है ?" वह ख़ुशी के मारे सिसक पड़ी, बोली भैया, "संगीत एकदम ठीक है, आराम से सो रहा है, डाक्टरों का भी कहना था कि न जाने कैसे  इस बालक की हालत में अकस्मात् सुधार आ गया तथा उन्होंने कल ११:३० बजे रात्रि में हमें छुट्टी भी दे दी थी, मैंने कहा, मेरी बहन! श्री बालाजी महाराज, मेहन्दीपुर वालों की कृपा से यह सब हुआ है।

Thursday, January 26, 2017

राम नाम गुण गारे मनवा


प्रात:स्मरणीय परम श्रद्धेय श्री सद्गुरुदेव भगवान द्वारा सियोल (दक्षिण कोरिया) व दिल्ली के मध्य मार्ग में हवाई यात्रा के दौरान २७:१२:२००१ बुधवार मध्याह्न १२:२२(भारतीय समय) रचित एक हृदयस्पर्शी भजन।

राम नाम गुण गारे मनवा, राम नाम गुण गारे....
मिला अमोला नर का चोला इसको सफल बनारे....
राम नाम गुण गारे मनवा, राम नाम गुण गारे....।

तेरा कमाया हुआ खजाना साथ तेरे ना जायेगा,
धरा रहेगा यहीं जगत में फिर पाछे पछतायेगा।
जो आवे तेरे काम वहां पे ऐसा खर्च बना लेरे...
राम नाम गुण गारे मनवा, राम नाम गुण गारे....।

सांस-सांस के साथ में भोले जिंदगी तेरी बीत रही,
बचपन बीता खेल खेल में, है अभी जवानी बीत रही,
जीवन तेरा होय सफल तू ऐसा जतन बना लेरे....
राम नाम गुण गारे मनवा, राम नाम गुण गारे....।

आज करूँगा कल करूँगा समय चला यूँही जाएगा....
राम नाम के बिना ही पगले यहां से वापस जाएगा।
भजन बिना तू धनी बना भी लौट भिखारी जायेगा....
राम नाम की बांध के पूँजी जीवन सफल बना लेरे....
राम नाम गुण गारे मनवा, राम नाम गुण गारे....।

राम नाम से पत्थर तर गये तुलसी जी ने गाया रे...
कृष्ण नाम से मीराजी ने जहर में अमृत पाया रे...
नाम की मिसरी घोल के पगले जीवन मधुर बना लेरे...
राम नाम गुण गारे मनवा, राम नाम गुण गारे....॥

Tuesday, January 24, 2017

"महात्मा उद्दालक"


परम श्रद्धेय गुरूदेव द्वारा रचित पुस्तिका "नैतिक शिक्षा" में से साभार

महर्षि आयोदधौम्य जंगल में रहकर अनेक विद्यार्थियों को पढ़ाया करते थे। उस समय छात्रों का वास दिन रात आचार्यों के ही समीप हुआ करता था तथा वे विद्या अध्ययन के साथ -साथ कठिन परिश्रम भी करते थे। एक बार महर्षि ने अपने प्रिय शिष्य आरूणि को धान के खेत की मेढ़ ठीक करने के लिये भेजा। नन्हा बालक बार -बार मिट्टी डालने पर भी मेढ़ से बहते पानी को नहीं रोक सका। फिर वह खुद ही मेढ़ में लेट गया तथा रात्रि होने पर भी जब महर्षि धौम्य ने आरूणि को आश्रम में नहीं देखा तो वे चिन्तित होकर स्वयं खेत की ओर दौड़ पड़े। भावुक होकर अपने पुत्र के समान प्रिय शिष्य को गले से लगा लिया। बालक फिर भी यही कहता रहा गुरूजी मैं वहीं लेट जाता हूँ अन्यथा खेत का सारा पानी बाहर बह जायेगा। गुरूदेव अत्यंत द्रवित होकर बोले - बेटा तूने मेरी आज्ञा का पालन करने के लिये अपने प्राणों तक की परवाह किये बिना कार्य किया है। मैं तुझ पर अति प्रसन्न हूँ। अतः योग विधि से समस्त विद्यायें आज ही प्राप्त हो जायेंगी। प्रसिद्ध गुरू भक्त आरूणि नाम का यह बालक उसी समय से महर्षि उद्दालक के नाम से प्रसिद्ध हो गया।